नई दिल्ली/रायपुरः गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के लाल किले पर आयोजित होने वाले भारत पर्व 2025 में इस बार छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और रामनामी समुदाय की झलक देखने को मिलेगी। छत्तीसगढ़ की झांकी भारत सरकार की थीम ‘स्वर्णिम भारत : विरासत और विकास’ पर आधारित है। झांकी में प्रदेश की समृद्ध और विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत को दिखाया गया है।
झांकी के आगे के हिस्से में निराकार राम की उपासना करने वाले रामनामी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती स्त्री और पुरुष को दिखाया गया है। इनके शरीर और कपड़ों पर 'राम-राम' शब्द अंकित है। इन्हें रामचरितमानस का पाठ करते हुए दिखाया गया है। इसके पास घुंघरुओं का प्रदर्शन किया गया है, जो भजन के लिए उपयोग होते हैं। बीच के हिस्से में आदिवासी संस्कृति के पहनावे, आभूषण, कलाकृतियां और कला परंपराएं दर्शाई गई हैं। इस भाग में तुरही वाद्य यंत्र और सल्फी वृक्ष को प्रमुखता से दिखाया गया है, जो बस्तर के लोकजीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। झांकी के पीछे मयूर का अंकन किया गया है, जो कि लोक जीवन के सौंदर्य और जीवंतता का प्रतीक है। झांकी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर और प्रकृति से जुड़ी आध्यात्मिकता को गहराई से उजागर किया गया है।
कौन है रामनामी समुदाय
साल 1870 में जांजगीर चांपा जिले के चारपारा गांव में सतनामी समाज के रामभक्त परशुराम भारद्वाज ने शरीर पर राम नाम का गोदना करवाया था। इसके बाद परशुराम के शिष्य और समर्थक भी राम नाम का गोदना करवाने लगे। धीरे-धीरे यह समाज पूरे शरीर पर रामनाम का गोदना करवाने लगा। रामनामी चादर, सिर पर मोरपंख की पगड़ी और घुंघरू इन लोगों की खास पहचान होती है। इस समुदाय के लिए श्रीराम उनके जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग है। प्रभु श्रीराम की भक्ति और उनका गुणगान ही इनके जीवन का उदेश्य है।
रामनामी वर्ण और जाति विहीन समुदाय है। इसमें कोई गुरु शिष्य नहीं, कोई छोटा–बड़ा नहीं है। कोई मूर्ति, मंदिर, देवी-देवता, कर्म कांड नहीं है। न स्वर्ग है न नर्क है न मोक्ष है, केवल नाम का स्मरण है और बस उसी में रमना है। रामनामी लोग मृत्यु के बाद शव को जलाते नहीं, बल्कि पंचतत्व में विलीन करते हैं। उनका मानना है कि वो राम नाम को जलते हुए नहीं देख सकते।